विषय-सूची

‘पूंजी’ के जर्मन, फ्रांसीसी और अंग्रेजी संस्करणों के लिए कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स द्वारा लिखित भूमिकाएँ और अनुकथन
पहले जर्मन संस्करण की भूमिका
दूसरे जर्मन संस्करण का अनुकथन
फ्रांसीसी संस्करण की भूमिका

फ्रांसीसी संस्करण का अनुकथन

तीसरे जर्मन संस्करण की भूमिका

अंग्रेजी संस्करण की भूमिका

चौथे जर्मन संस्करण की भूमिका

पहली पुस्तक

पूंजीवादी उत्पादन

पूँजी के प्रथम खंड के ३४६ पेज तक की पीडीऍफ़ . साइज़ १६ mbs है.  PDF

भाग एकपण्य और द्रव्य भाग दो द्रव्य का पूंजी में रूपांतरण भाग तीन निरपेक्ष बेशी पूंजी का उत्पादन भाग चार सापेक्ष बेशी मूल्य का उत्पादन
भाग पॉँच निरपेक्ष और सापेक्ष बेशी मूल्य का उत्पादन भाग छह मज़दूरी भाग सात पूंजी का संचय भाग आठ तथाकथित आदिम संचय

निर्देशिकाएँ

भूमिका

दूसरी पुस्तक

पूंजी के परिचलन की प्रक्रिया

भाग एक

पूंजी के रूपांतरण और उनके परिपथ

भाग दो

पूंजी का आवर्त

भाग तीन

कुल सामाजिक पूंजी का पुनरुत्पादन तथा परिचलन

नाम निर्देशिका और विषय निर्देशिका

भूमिका

तीसरी पुस्तक

समग्र रूप में पूंजीवादी उत्पादन प्रक्रिया

भाग एक

बेशी मूल्य का लाभ में और बेशी मूल्य दर का लाभ दर में परिवर्तन

भाग दो

लाभ और औसत लाभ में रूपांतरण

भाग तीन

लाभ दर के गिरने की प्रवृति का नियम

भाग चार

पन्य पूंजी तथा द्रव्य पूंजी का वाणिज्यिक पूंजी और द्रव्य-व्यापार पूंजी में रूपांतरण

(व्यापारी पूंजी)

भाग पांच

लाभ का ब्याज तथा उद्यम के लाभ में विभाजन | ब्याजी पूंजी

भाग छह

बेशी लाभ का किराया ज़मीन में रूपांतरण

भाग सात

सम्प्राप्तियाँ तथा उनके स्रोत

नाम-निर्देशिका और सन्दर्भ-

निर्देशिका

मार्क्स की रचना ‘पूंजी’ का सार और इससे आगे

मार्क्स की रचना ‘पूंजी’ से अगर हम कुछ सीखते हैं तो वह होना चाहिए कि पूंजीवाद  अपने रुझान द्वारा अपनी ज़रुरत के लिए मेहनतकश ज़मात पैदा करता है जिसे सर्वहारा वर्ग कहते हैं लेकिन यही  मेहनतकश पूंजीवाद की इन ज़रूरतों को “स्वयं सिद्ध प्राकृतिक नियम” मानता है, क्यों ? जवाब सच में सरल है | पूंजीवादी उत्पादन प्रक्रिया के तहत;

१) मजदूरी की प्रक्रिया एक गणितीय अंक या इकाई नहीं है जबकि इसको समय के गणितीय अंक से गुणा किया जाता है | इसी कमी के चलते मजदूर की मजदूरी का सही मूल्यांकन हो ही नहीं सकता जिसके चलते मजदूरों के शोषण की प्रक्रिया छिपी हुई दीखती है | मार्क्स इस गुत्थी को खोलने में कामयाब हुए | उन्होंने दिखा दिया कि किसी वस्तु का मूल्य उसमें निहित मानव श्रम के सिवा कुछ नहीं है | मूल्य एक ऐतिहासिक, वस्तुगत  और सामाजिक प्रक्रिया से  किसी  अन्य वस्तु जिसके उत्पादन की प्रक्रिया में  उतनी ही श्रम के समय की इकाईयां निहित होती हैं के साथ विनिमय द्वारा इस पूंजीवाद के रंगमंच पर प्रस्तुत होता है |

२) न्याय और निष्पक्षता की  सभी धारणाएँ धन के लिए श्रम का  विनिमय’ के इसी स्वरूप पर आधारित होती हैं |

३) पूंजी जो श्रम का उत्पाद होती है ऐसे दीखती है जैसे यह पूंजीपतियों द्वारा आवश्यक और स्वतन्त्र योगदान हो और जैसे यह अलग से प्रतिफल की हक़दार है |

४) सर्वहारा लोग, जैसाकि पूंजीवादी संबंधों में वे वैयक्तिक दीखते हैं लेकिन अपनी ज़रूरतों की पूर्ति के लिए वे वास्तव में पूंजी के गुलाम होते हैं |

तदनुसार, पूंजी की प्रकृति की समझ के अभाव में, सर्वहारा लोग कितने भी संघर्ष करलें, ये संघर्ष न्याय की निष्पक्षता के लिए पूंजीवादी संबंधों की चौहद्दी से आगे नहीं जाते | ज्यादा से ज्यादा वे ट्रेड यूनियन या सामाजिक-जनवादी चेतना को बढा सकते हैं  जिससे पूंजी के तर्क पर कोई आंच नहीं आती | इस तरीके से , संघर्ष में लोगों की स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया पूंजी के पार न तो जाती है और न ही जा सकती है |  मार्क्सवादियों की जिम्मेदारी ‘पूंजी‘ के सार को सर्वहारा तक ले जाने की है ताकि मजदूर वर्ग अपनी मुक्ति के लिए इस पूंजीवाद की चौहद्दी से पार देख सके |

इंटरनेट पर हिंदी के संजीदा पाठकों और मार्क्सवाद के शुभचिंतकों और कार्यकर्त्ताओं के नाम अपील

वर्तमान विश्व लगभग एक शताब्दी पूर्व साम्राज्यवाद में प्रवेश कर गया था जिसका विश्लेषण लेनिन ने ‘साम्राज्यवाद , पूंजीवाद की सर्वोच्च  मंजिल’ में  किया था | लेकिन उस वक्त से लेकर आज तक  मार्क्स द्वारा लिखित ‘पूंजी’ में वर्णित पूंजीवाद के मूलभूत सिद्धांत पूंजीवाद की गतिकी का सांगोपांग विश्लेषण करते रहे हैं | डिजिटल तकनीक के तेजी से उभरते हुए इस युग में,इस अमूल्य पुस्तक के हिंदी संस्करण की इंटरनेट जैसे माध्यम पर उपलब्धता बहुत ज़रूरी है |

इस मुहीम का उद्देश्य इस पुस्तक को एक  कॉपीराइट मुक्त संस्करण के रूप में इंटरनेट पर उपलब्ध करवाना है जो आप लोगों के सहयोग के बिना बहुत मुश्किल है | अगर हम मिल-बांटकर काम करें तो इसे  ज़ल्दी ही उपलब्ध करवाया जा सकता है | ‘यूनिकोड’ में टाइप किए गए पृष्ठ ही स्वीकार्य हैं |

मकसद का चुनाव

कुछ भी कहने को कहा

तो क्या कहा,

कुछ भी पढने को पढ़ा

तो क्या पढ़ा,

कुछ भी लिखने को लिखा

तो क्या लिखा,

कुछ भी करने को किया

तो क्या किया ?

आओ चुनें

दुनिया बदलने का मकसद,

और इस खातिर

कुछ कहें |

कुछ पढ़े |

कुछ लिखें |

कुछ करें |

-लखविंदर

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं की पत्रिका ‘आह्वान’ से साभार

आपसी सहयोग और तालमेल बनाने के लिए संपर्क करें :

marxpoonji@yahoo.in

Advertisements
प्रकाशित on जुलाई 3, 2009 at 2:59 अपराह्न  Comments (6)  

The URI to TrackBack this entry is: https://marxpoonji.wordpress.com/trackback/

RSS feed for comments on this post.

6 टिप्पणियाँ

  1. बहुत अच्छा प्रयास है। बधाई।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

  2. समयानुकूल सही जुंबिश।

  3. samay ki yehi maang hai

  4. Aap bahut bada kaam kar rahay hain,
    Aap ki mehnat ko salaam…!

  5. यदि मैं किसी काम आ सकूं तो मुझे प्रसन्नता होगी।

  6. इस पेज पर टिप्पणियां रोक दी गयी हैं. आप अपनी टिप्पणियां ‘विचार-विमर्श फोरम’ पर भेज सकते हैं.


टिप्पणियाँ बंद कर दी गयी है.